जलियांवाला बाग हत्याकांड 1919: बैसाखी का काला दिन जिसने बदल दिया भारत का इतिहास



13 अप्रैल 1919, बैसाखी का पावन दिन… अमृतसर के जलियांवाला बाग में हजारों लोग शांति से इकट्ठा हुए थे। लेकिन अचानक यह दिन इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में बदल गया।

ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया। लगभग 1,650 गोलियां चलाई गईं, जिससे सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान चली गई।रॉलेट एक्ट इस हत्याकांड की जड़ में था , जिसने भारतीयों की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया था।लोग इस अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध कर रहे थे, लेकिन उन्हें बेरहमी से कुचल दिया गया।

1919 से पहले भारत का आंदोलन मुख्यतः शांतिपूर्ण और संवैधानिक था।लेकिन इस घटना ने सब कुछ बदल दिया पहले याचिकाएं और बातचीत,बाद में: जनआंदोलन, जिसमें किसान, मजदूर और छात्र शामिल हुएयह घटना स्वतंत्रता संग्राम की दिशा बदलने वाली साबित हुई।


महात्मा गांधी का ब्रिटिश शासन पर विश्वास इस घटना के बाद पूरी तरह टूट गया।

1920 में असहयोग आंदोलन शुरू किया“पूर्ण स्वराज” की मांग को गति मिलीरवीन्द्रनाथ टैगोर ने 30 मई 1919 को अपनी “नाइटहुड” उपाधि लौटा दी।उनका संदेश साफ था— “ऐसे अमानवीय कृत्य सभ्य सरकारों में नहीं होते।”ब्रिटिश सरकार द्वारा गठित हंटर आयोग ने चौंकाने वाले खुलासे किए।

डायर ने खुद स्वीकार किया कि:वह पहले से गोली चलाने का फैसला कर चुका थाउसका उद्देश्य केवल भीड़ को हटाना नहीं, बल्कि आतंक फैलाना थाफिर भी, उसे कड़ी सजा नहीं मिली।

ऊधम सिंह ने इस नरसंहार का बदला लेने के लिए 21 साल इंतजार किया।1940 में लंदन मेंमाइकल ओ'डायर की हत्या कीउनका नाम “राम मोहम्मद सिंह आज़ाद” भारत की एकता का प्रतीक बना।

सी. शंकरन नायर ने विरोध में इस्तीफा दे दिया।यह कदम इतना प्रभावशाली था कि ब्रिटिश सरकार को प्रेस सेंसरशिप हटानी पड़ी।यहां तक कि विंस्टन चर्चिल ने भी इस घटना को गलत बताया।

100 साल से अधिक समय बीत जाने के बाद भी:ब्रिटेन ने “खेद” तो जतायालेकिन औपचारिक माफी अब तक नहीं दी,यह घटना आज भी भारत के इतिहास में एक गहरे घाव की तरह है।

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