गांव के विकास पर सवाल: राशन के लिए 8 किमी दूरी, सड़क-पानी-बिजली और रोजगार की समस्या


देवरा तालुका, गोंधिया जिले के एक गांव की कहानी सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह उस सोच पर सवाल है, जिसमें किसी व्यक्ति से अच्छे व्यक्तिगत संबंध होने के कारण लोग उसके सार्वजनिक कामकाज पर सवाल पूछने से भी डरने लगते हैं।

गांव में किसी व्यक्ति का अच्छा व्यवहार होना अच्छी बात है।

वह लोगों के व्यक्तिगत काम कर देता हो, जरूरत के समय मदद करता हो, सभी से अच्छे से बात करता हो, पुराने लोगों से उसके संबंध अच्छे हों—तो निश्चित रूप से उसका सम्मान होना चाहिए।

किसी व्यक्ति से हमारे व्यक्तिगत संबंध अच्छे हो सकते हैं।
हम उसका सम्मान भी कर सकते हैं।
उसने कभी हमारा काम किया हो, तो हम उसके आभारी भी हो सकते हैं।

लेकिन जब बात पूरे गांव के विकास की हो, तब सवाल व्यक्ति को देखकर नहीं, बल्कि गांव के भविष्य को देखकर पूछे जाने चाहिए।

और आज गांव के सामने कई ऐसे सवाल हैं, जिन पर अब खुलकर और शांतिपूर्ण तरीके से चर्चा होना जरूरी है।


सबसे पहले राशन का सवाल: 8 किलोमीटर दूर क्यों?

गांव के ग्रामीणों के अनुसार, राशन लेने के लिए उन्हें लगभग 8 किलोमीटर दूर भटागांव जाना पड़ता है।

यह व्यवस्था वर्षों से चली आ रही बताई जा रही है।

किसी युवा के लिए 8 किलोमीटर जाना शायद उतना मुश्किल न लगे, लेकिन हर ग्रामीण की स्थिति एक जैसी नहीं होती।

महिलाओं के लिए यह दूरी ज्यादा परेशानी वाली है।

घर का काम, छोटे बच्चों की जिम्मेदारी, परिवार की अन्य जिम्मेदारियां और उसके बाद राशन लेने के लिए 6 किलोमीटर दूर जाना—यह आसान काम नहीं है।

बुजुर्ग महिला को क्या करना होगा?

जिस महिला के पास वाहन नहीं है, वह कैसे जाएगी?

जिस परिवार में पुरुष रोज मजदूरी पर जाता है, वह राशन लेने कौन जाएगा?

बारिश के मौसम में क्या होगा?

बीमारी या शारीरिक कमजोरी वाले व्यक्ति के लिए क्या व्यवस्था है?

राशन कोई विलासिता की चीज नहीं है।

राशन गरीब और जरूरतमंद परिवार के लिए जरूरी सरकारी सुविधा है।

महाराष्ट्र के खाद्य, नागरी पुरवठा एवं ग्राहक संरक्षण विभाग की व्यवस्था में राशन दुकानों के माध्यम से लाभार्थियों को खाद्यान्न वितरित किया जाता है। विभाग ने राशन संबंधी शिकायतों के लिए 1800-22-4950 और 1967 तथा One Nation-One Ration Card के लिए 14445 हेल्पलाइन दी है।

महाराष्ट्र के RCMS पोर्टल पर राशन कार्ड, पात्रता और Fair Price Shop से संबंधित जानकारी तथा ऑनलाइन शिकायत की सुविधा भी उपलब्ध है।

तो सवाल यह है—

अगर गांव के लोगों को वर्षों से 8 किलोमीटर दूर जाना पड़ रहा है, तो क्या इस व्यवस्था की दोबारा समीक्षा नहीं होनी चाहिए?


क्या राशन सिर्फ इसलिए दूर रहेगा क्योंकि व्यवस्था पुरानी है?

गांव में अक्सर एक वाक्य सुनने को मिलता है—

"अरे, सालों से ऐसे ही चल रहा है।"

लेकिन कोई व्यवस्था पुरानी होने से जरूरी नहीं कि वह हमेशा सही ही हो।

अगर पहले गांव की आबादी कम थी, तब जो व्यवस्था ठीक रही होगी, वह आज भी ठीक हो यह जरूरी नहीं।

आबादी बढ़ी होगी।
राशन कार्ड बढ़े होंगे।
महिलाओं और बुजुर्गों की संख्या बढ़ी होगी।
लोगों की जरूरतें बदली होंगी।

तो व्यवस्था भी समय के साथ बदलनी चाहिए।

पुरानी व्यवस्था का सम्मान हो सकता है, लेकिन पुरानी परेशानी को हमेशा के लिए स्वीकार करना जरूरी नहीं।


अब बात सिर्फ राशन की नहीं है

अगर गांव की समस्या केवल राशन तक होती तो शायद एक शिकायत से मामला खत्म हो जाता।

लेकिन ग्रामीणों के सवाल इससे कहीं बड़े हैं।

सवाल है—

गांव की सड़कें कैसी हैं?

रास्तों की हालत कैसी है?

पानी की व्यवस्था पर्याप्त है या नहीं?

स्ट्रीट लाइट और बिजली की समस्या है या नहीं?

गांव के युवाओं के लिए रोजगार के अवसर हैं या नहीं?

गांव में पुस्तकालय या अभ्यासिका जैसी सुविधा क्यों नहीं होनी चाहिए?

ग्रामसभा में लोग कितने आते हैं?

ग्रामसभा में गांव के असली मुद्दों पर कितनी चर्चा होती है?

ग्रामपंचायत को मिलने वाले पैसों का कितना आणि कुठे खर्च होतो?

ये सवाल किसी एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं।

ये गांव के विकास के सवाल हैं।


ग्रामसभा में जाना इतना जरूरी क्यों है?

बहुत से पुराने ग्रामीणों को शायद यह लगता हो कि—

"ग्रामसभा में जाकर क्या फायदा?"

यही सोच बदलने की जरूरत है।

महाराष्ट्र सरकार की जानकारी के अनुसार ग्रामसभा में गांव के मताधिकार प्राप्त लोग सदस्य होते हैं और ग्रामपंचायत ग्रामसभेच्या प्रति जवाबदार होती है। ग्रामसभा के माध्यम से विकास, खर्च और गांव के विभिन्न विषयों पर चर्चा तथा संबंधित विभागों को प्रस्ताव/सूचना भेजने की प्रक्रिया होती है।

इसका आसान मतलब समझिए—

ग्रामसभा सिर्फ बैठने की जगह नहीं है।

वह गांव की सामूहिक आवाज है।

अगर गांव में सड़क चाहिए—ग्रामसभा में बोलिए।

अगर पानी की समस्या है—ग्रामसभा में बोलिए।

अगर स्ट्रीट लाइट चाहिए—ग्रामसभा में बोलिए।

अगर रोजगार की समस्या है—ग्रामसभा में बोलिए।

अगर युवाओं के लिए लाइब्रेरी चाहिए—ग्रामसभा में प्रस्ताव रखिए।

अगर राशन की दूरी की समस्या है—ग्रामसभा में चर्चा कीजिए।

अगर पंचायत के खर्च को लेकर सवाल है—हिसाब मांगिए।

ग्रामसभा में जाना किसी व्यक्ति के खिलाफ जाना नहीं है।

यह अपने गांव के लिए जाना है।


"उससे संबंध खराब हो जाएंगे" — क्या यही डर गांव को रोक रहा है?

यह शायद सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है।

कई ग्रामीण किसी व्यक्ति के खिलाफ इसलिए नहीं बोलना चाहते क्योंकि उनके व्यक्तिगत संबंध अच्छे हैं।

किसी ने कभी उनका काम कर दिया।

किसी के परिवार से पुराने संबंध हैं।

किसी जरूरत के समय मदद की।

किसी का प्रमाणपत्र बनवाने में मदद की।

किसी की समस्या सुन ली।

और फिर मन में एक बात बैठ गई—

"वह अच्छा आदमी है, उसके खिलाफ क्यों बोलना?"

लेकिन यहां एक बहुत सरल बात समझने की जरूरत है।

किसी व्यक्ति का अच्छा व्यवहार उसकी अच्छाई है।

लेकिन सार्वजनिक पद पर बैठने के बाद जवाबदेही उसका कर्तव्य है।

अगर वह अच्छा व्यक्ति है तो उससे सवाल पूछने पर उसे भी जवाब देने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

और अगर हम सवाल पूछते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि हम उसका अपमान कर रहे हैं।


व्यक्ति को देखकर सवाल रोक दिए तो गांव कब आगे बढ़ेगा?

मान लीजिए गांव में एक व्यक्ति बहुत अच्छा है।सभी उससे खुश हैं।वह लोगों के व्यक्तिगत काम कर देता है।लेकिन गांव में सड़क खराब है।पानी की समस्या है।रोजगार नहीं है।लाइब्रेरी नहीं है।स्ट्रीट लाइट की समस्या है।ग्रामसभा में लोग नहीं जाते।

पंचायत के खर्च की जानकारी लोगों को नहीं है।तो क्या केवल यह कह देना पर्याप्त है कि—

"व्यक्ति अच्छा है इसलिए सब ठीक है?"

नहीं।

क्योंकि गांव व्यक्ति से बड़ा है।सरपंच कोई निजी रिश्तेदार या परिवार का मुखिया नहीं होता।

वह एक सार्वजनिक पद पर होता है।इसलिए उसके काम की समीक्षा होना लोकतंत्र का सामान्य हिस्सा है।


पुराने लोगों को यह बात समझना जरूरी है

गांव के कई बुजुर्ग पुराने समय से एक-दूसरे को जानते हैं।

रिश्ते पुराने हैं।सुख-दुख में एक-दूसरे के साथ रहे हैं।इसलिए किसी के खिलाफ बोलना उन्हें अच्छा नहीं लगता।

यह भावना गलत नहीं है।रिश्ते बचाना अच्छी बात है।

लेकिन एक बात नई पीढ़ी को भी और पुराने लोगों को भी समझनी होगी—

"व्यक्ति से संबंध मत तोड़िए, लेकिन गांव के सवाल मत छोड़िए।"

आप किसी व्यक्ति को नमस्कार भी कर सकते हैं।उसके साथ बैठ भी सकते हैं।

उसके अच्छे काम की तारीफ भी कर सकते हैं।लेकिन ग्रामसभा में खड़े होकर यह भी पूछ सकते हैं—

"हमारे गांव की सड़क कब बनेगी?"

"पानी की समस्या कब हल होगी?"

"राशन के लिए महिलाओं को 6 किलोमीटर कब तक जाना पड़ेगा?"

"गांव के युवाओं के लिए क्या योजना है?"

"पुस्तकालय क्यों नहीं है?"

"ग्रामपंचायत की निधि का कितना खर्च हुआ?"

इसमें कोई विरोधाभास नहीं है।


"मेरा काम हो गया" वाली सोच से गांव का नुकसान

गांव में एक और समस्या हो सकती है।

किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत काम हो गया तो वह सोचता है—

"मुझे क्या लेना-देना?"

लेकिन गांव की व्यवस्था व्यक्तिगत काम से नहीं चलती।

आज आपका काम हो गया।कल आपके बच्चे को सड़क चाहिए होगी।

परसों किसी बुजुर्ग को पानी चाहिए होगा।किसी महिला को राशन लेने जाना होगा।

किसी युवक को रोजगार चाहिए होगा।किसी छात्र को पढ़ने के लिए लाइब्रेरी चाहिए होगी।

इसलिए सवाल केवल "मेरा काम हुआ या नहीं?" का नहीं होना चाहिए।

सवाल होना चाहिए—"हमारे पूरे गांव के लिए क्या हो रहा है?"


सड़क और रास्ते: सिर्फ आने-जाने का सवाल नहीं

गांव की सड़क अच्छी नहीं होगी तो सबसे ज्यादा नुकसान किसे होगा?

शेतकऱ्याला।मजदूर को।

स्कूल जाने वाले बच्चे को।बीमार व्यक्ति को।

गर्भवती महिला को।बुजुर्ग को।

दूध और कृषि उपज ले जाने वाले परिवार को।इसलिए सड़क केवल विकास का एक छोटा काम नहीं है।

अच्छा रास्ता गांव की अर्थव्यवस्था और लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा है।

ग्रामपंचायत की जिम्मेदारियों में गांव की सड़कें, पानी की व्यवस्था, स्वच्छता और स्ट्रीट लाइट जैसे विषय शामिल हैं।

तो ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि गांव के इन कामों के लिए क्या योजना बनाई गई है।


पानी: गांव का सबसे जरूरी सवाल

अगर गांव में पानी की समस्या है तो यह सिर्फ गर्मियों की समस्या नहीं है।

महिलाओं को पानी के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है।घर के काम पर असर पड़ता है।

बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो सकती है।और सबसे ज्यादा परेशानी उन्हीं परिवारों को होती है जिनके पास खुद का वाहन या निजी पानी की व्यवस्था नहीं है।इसलिए ग्रामसभा में पानी को प्राथमिक मुद्दा बनाना जरूरी है।


बिजली और स्ट्रीट लाइट का सवाल

रात में गांव की गलियां अंधेरी हों तो सबसे ज्यादा परेशानी किसे होती है?

महिलाओं को।बुजुर्गों को।बच्चों को।रात में काम से लौटने वाले मजदूरों को।

इसलिए स्ट्रीट लाइट भी गांव के विकास का जरूरी हिस्सा है।

अगर कोई लाइट बंद है, नई लाइट चाहिए या नियमित देखभाल नहीं हो रही, तो ग्रामीणों को यह मुद्दा ग्रामसभा में उठाना चाहिए।


गांव में रोजगार क्यों नहीं?

गांव का युवा अगर रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर है तो यह भी गांव के विकास का प्रश्न है।

हर युवा को गांव में सरकारी नौकरी मिले, यह संभव नहीं।

लेकिन पंचायत और संबंधित विभागों के माध्यम से उपलब्ध रोजगार योजनाओं, कौशल प्रशिक्षण, स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण आजीविका और स्थानीय रोजगार के अवसरों की जानकारी ग्रामीणों तक पहुंचना जरूरी है।

ग्रामपंचायत का काम केवल सड़क और नाली तक सीमित नहीं होना चाहिए।

गांव के युवाओं का भविष्य भी गांव के विकास का हिस्सा है।


गांव में लाइब्रेरी क्यों नहीं?

यह सवाल छोटा लग सकता है।

लेकिन गांव के विद्यार्थी के लिए यह बहुत बड़ा सवाल है।

जिस बच्चे के पास पढ़ने के लिए शांत जगह नहीं है, महंगी किताबें खरीदने की क्षमता नहीं है और इंटरनेट की सुविधा भी सीमित है, उसके लिए एक छोटी सी ग्राम वाचनालय/अभ्यासिका भी बहुत उपयोगी हो सकती है।

आज गांव के बच्चे प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।

किसी को पुलिस भर्ती करनी है।किसी को MPSC की तैयारी करनी है।

किसी को SSC करनी है।किसी को शिक्षक बनना है।

किसी को सरकारी नौकरी चाहिए।तो सवाल होना चाहिए—

हमारे गांव के बच्चों के लिए पढ़ने की सुविधा क्यों नहीं हो सकती?


पंचायत के पैसों का हिसाब जनता को पता होना चाहिए

यह सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है।

अगर ग्रामीणों को लगता है कि पंचायत में भ्रष्टाचार हो रहा है, तो केवल आरोप लगाकर मामला खत्म नहीं होना चाहिए।

सबसे अच्छा तरीका है—हिसाब मांगना।

कितना पैसा आया?

किस योजना से आया?

किस काम के लिए आया?

काम कितना हुआ?

कितना भुगतान हुआ?

किसे भुगतान हुआ?

काम की गुणवत्ता कैसी है?

इन सवालों के जवाब दस्तावेजों में मिलने चाहिए।

भारत सरकार का eGramSwaraj प्लेटफॉर्म ग्रामपंचायतों की योजना, कामों की प्रगति और वित्तीय प्रगति को डिजिटल रूप से ट्रैक करने के लिए बनाया गया है।

वित्त वर्ष 2026-27 के पंचायत नियोजन से संबंधित अपडेट भी पंचायती राज मंत्रालय ने जुलाई 2026 में जारी किए हैं।

इसलिए आज ग्रामीणों के पास पहले की तुलना में जानकारी लेने के अधिक साधन हैं।


"भ्रष्टाचार है" कहने से आगे बढ़कर "हिसाब दिखाइए" कहना चाहिए

अगर किसी को लगता है कि पंचायत में भ्रष्टाचार हुआ है तो सबसे मजबूत सवाल होगा—

"कागज दिखाइए।"

यह बात किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं है।

अगर सब कुछ सही है तो दस्तावेज से बात साफ हो जाएगी।

अगर कोई गड़बड़ी है तो दस्तावेज से वह भी सामने आ सकती है।

जरूरत पड़ने पर सूचना का अधिकार यानी RTI भी इस्तेमाल किया जा सकता है। महाराष्ट्र ग्रामविकास विभाग ने RTI Act और संबंधित नियमों की जानकारी उपलब्ध कराई है।


ऑपरेटर, पुलिस पाटील या किसी अन्य सेवा में पैसे लेने की बात हो तो क्या करें?

ग्रामीणों की ओर से अलग-अलग स्थानीय सेवाओं में पैसे लिए जाने की बातें सामने आती हैं।

लेकिन यहां भी एक बात जरूरी है—

बिना प्रमाण किसी व्यक्ति को भ्रष्ट कहना सही नहीं है।

अगर किसी काम के लिए पैसा लिया जाता है तो ग्रामीण पूछ सकते हैं—

"यह पैसा किस नियम के तहत है?"

"इसकी सरकारी फीस कितनी है?"

"रसीद क्यों नहीं दी जा रही?"

अगर सरकारी फीस है तो रसीद होनी चाहिए।

अगर कोई व्यक्ति अपनी तरफ से पैसा मांग रहा है, तो शिकायत के लिए उचित विभाग और अधिकारी के पास जाना चाहिए।

यानी—

आरोप नहीं, प्रमाण।

अफवाह नहीं, दस्तावेज।

झगड़ा नहीं, लिखित शिकायत।

यही सही रास्ता है।


अब गांव के लोगों को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले किसी व्यक्ति के खिलाफ माहौल बनाने की जरूरत नहीं है।

गांव के 10-20 या उससे ज्यादा लोग मिलकर गांव के विकास के मुद्दों की एक सूची बनाएं।

उसमें लिखें—

  1. राशन के लिए 6 किलोमीटर की दूरी।
  2. महिलाओं और बुजुर्गों को होने वाली परेशानी।
  3. सड़क और रास्तों की स्थिति।
  4. पानी की समस्या।
  5. बिजली/स्ट्रीट लाइट।
  6. गांव में रोजगार के अवसर।
  7. विद्यार्थियों के लिए लाइब्रेरी/अभ्यासिका।
  8. ग्रामसभा में ग्रामीणों की भागीदारी।
  9. पंचायत के विकास कार्यों और खर्च का विवरण।
  10. सरकारी योजनाओं का लाभ कितने लोगों को मिला।
  11. स्थानीय सेवाओं में किसी प्रकार का शुल्क लिया जाता है तो उसकी आधिकारिक जानकारी।
  12. अधूरे या खराब विकास कार्यों की जांच।
  13. भविष्य के लिए गांव की विकास योजना।

फिर यह मुद्दे ग्रामसभा में लिखित रूप से रखें।


ग्रामसभा में सवाल पूछना मतलब लड़ाई करना नहीं है

पुराने लोगों को शायद यह डर हो—

"सवाल पूछेंगे तो झगड़ा होगा।"

ऐसा जरूरी नहीं।

आप बहुत शांत भाषा में पूछ सकते हैं—

"हम किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं हैं। हमारा सवाल सिर्फ गांव के विकास के बारे में है।"

"हमें राशन के लिए 6 किलोमीटर जाना पड़ता है। इसका समाधान क्या है?"

"गांव की सड़क के लिए कितनी निधि मंजूर हुई?"

"पानी की समस्या के लिए क्या योजना है?"

"गांव में लाइब्रेरी बनाने की संभावना है क्या?"

"ग्रामपंचायत के पिछले कामों और खर्च का विवरण ग्रामीणों को बताया जाए।"

ऐसे सवालों में किसी व्यक्ति का अपमान नहीं है।

यही लोकतंत्र है।


आज चुप रहे तो कल बच्चे सवाल पूछेंगे

आज गांव का कोई बुजुर्ग कह सकता है—

"हमारा उस व्यक्ति से संबंध अच्छा है, इसलिए हम कुछ नहीं बोलेंगे।"

लेकिन कल आपका बेटा या बेटी पूछेगा—

"हमारे गांव में लाइब्रेरी क्यों नहीं थी?"

"हमारे गांव के रास्ते खराब क्यों होते?"

"राशन के लिए महिलाओं को 6 किलोमीटर क्यों जाना पड़ता था?"

"ग्रामसभा में लोग सवाल क्यों नहीं पूछते थे?"

उस समय हमारे पास क्या जवाब होगा?

इसलिए आज सवाल किसी व्यक्ति से नहीं है।

सवाल हमारी आने वाली पीढ़ी से है।


व्यक्ति अच्छा हो सकता है, लेकिन व्यवस्था उससे भी अच्छी होनी चाहिए

यह पूरी बात एक वाक्य में समझी जा सकती है—

"व्यक्ति अच्छा हो तो उसका सम्मान करो, लेकिन व्यवस्था अच्छी हो इसके लिए सवाल जरूर पूछो."

अगर कोई सरपंच अच्छा है तो उसे भी खुशी होनी चाहिए कि गांव के लोग ग्रामसभा में आएं, विकास के सवाल पूछें और पंचायत को मजबूत बनाएं।

अगर पंचायत में सब काम नियम के अनुसार हो रहे हैं, तो सवालों से डरने की जरूरत नहीं।

और अगर कहीं कमी है, तो सवालों से उसे सुधारा जा सकता है।


गांव किसी एक व्यक्ति का नहीं है

गांव में हर परिवार का हिस्सा है।

किसी का घर छोटा है या बड़ा।

कोई गरीब है या किसान।

कोई मजदूर है।

कोई सरकारी कर्मचारी है।

कोई महिला है।

कोई बुजुर्ग है।

कोई विद्यार्थी है।

कोई बेरोजगार युवा है।

गांव सभी का है।

इसलिए गांव का विकास भी सभी के लिए होना चाहिए।

किसी एक व्यक्ति से अच्छे संबंध होना अच्छी बात है।

लेकिन उन्हीं संबंधों के कारण अगर पूरा गांव अपने अधिकारों और सवालों से पीछे हट जाए, तो यह सही नहीं होगा।


अब जरूरत है "व्यक्ति की राजनीति" से "गांव की राजनीति" की तरफ जाने की

गांव की राजनीति का मतलब किसी व्यक्ति को हराना नहीं होना चाहिए।

गांव की राजनीति का मतलब होना चाहिए—

किसके समय में कितनी सड़क बनी?

कितने घरों तक पानी पहुंचा?

कितनी स्ट्रीट लाइट लगी?

कितने रोजगार के अवसर बने?

विद्यार्थियों के लिए क्या किया गया?

कितनी निधि आई?

कितनी खर्च हुई?

कौन-से काम पूरे हुए?

कौन-से काम अधूरे हैं?

राशन जैसी मूलभूत सुविधा कितनी आसानी से मिल रही है?

यही असली विकास की चर्चा है।


अंतिम सवाल: हम व्यक्ति को बचाएंगे या गांव का भविष्य?

यह लेख किसी व्यक्ति को अच्छा या बुरा साबित करने के लिए नहीं है।

किसी से व्यक्तिगत संबंध खराब करना भी इसका उद्देश्य नहीं है।

उद्देश्य केवल इतना है कि गांव के लोग एक बात समझें—

व्यक्तिगत संबंध अपनी जगह हैं।

सार्वजनिक जवाबदेही अपनी जगह है।

आप किसी व्यक्ति का सम्मान करते हुए भी सवाल पूछ सकते हैं।

आप उसके अच्छे काम की तारीफ करते हुए भी उसके सार्वजनिक काम का हिसाब मांग सकते हैं।

आप उसके साथ संबंध बनाए रखते हुए भी ग्रामसभा में गांव के लिए आवाज उठा सकते हैं।

क्योंकि सवाल व्यक्ति से नहीं है।

सवाल है—हमारा गांव आगे कब बढ़ेगा?

राशन के लिए महिलाओं को 6 किलोमीटर जाना कब बंद होगा?

गांव के रास्ते कब सुधरेंगे?

पानी की समस्या कब सुटेगी?

वीज आणि स्ट्रीट लाइटची समस्या कधी कमी होईल?

युवाओं को रोजगार के लिए गांव से बाहर जाने की मजबूरी कब कम होगी?

विद्यार्थियों के लिए लाइब्रेरी कब बनेगी?

ग्रामसभा में हर परिवार की आवाज कब सुनाई देगी?

पंचायत के पैसे का हिसाब ग्रामीणों के सामने कब आएगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या हम किसी व्यक्ति को देखकर चुप रहेंगे, या अपने गांव के भविष्य को देखकर सवाल पूछेंगे?


एक बात याद रखिए

अच्छे संबंध रखिए।
अच्छे लोगों का सम्मान कीजिए।
लेकिन अपने अधिकार मत छोड़िए।

किसी से दुश्मनी मत कीजिए।
लेकिन गलत व्यवस्था को सामान्य भी मत मानिए।

किसी पर बिना प्रमाण आरोप मत लगाइए।
लेकिन प्रमाण मांगने से भी मत डरिए।

ग्रामसभा में जाइए।
सवाल लिखकर ले जाइए।
जवाब मांगिए।
जरूरत पड़े तो लिखित शिकायत कीजिए।

क्योंकि—

"गांव तब आगे बढ़ता है, जब गांव के लोग सवाल पूछना सीखते हैं।"

और सवाल पूछना किसी व्यक्ति का अपमान नहीं है।

सवाल पूछना अपने गांव के प्रति जिम्मेदारी है।

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